1857 के उपरांत गांधीजी के भारत छोडो आंदोलन से देशवासियो में स्वाधीनता प्राप्ति की लहर उठी

1857 के उपरांत गांधीजी के भारत छोडो आंदोलन से देशवासियो में स्वाधीनता प्राप्ति की लहर उठी
( भारत छोडो आंदोलन की वर्षगांठ 9 अगस्त 1942 पर विशेष)
( फोटो नंबर 1 एवं फोटो नीचे श्री पाटील )
भारत में बिट्रीश हुकुमत की जडे 1857 की क्रांति के उपरांत काफी गहरी हो चुकी थी। 1857 की क्रांति के उपरांत अंग्रेजो ने उन सारी गलतियो को एक‘-एक करके सुधारते हुये भारत में हुकुमत करने के लिये उन सभी प्रतिकूल परिस्थितियो को अनुकूल करते हुये आराम से भारत का आर्थिक शोषण करने के साथ ही देश में फूट डालो शासन करो की नीति को पल्लिवत करते हुये आगे बढ रहे थे। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के रंगभेद नीति के खिलाफ जो शंखनाद हुआ उसकी गुंज प्रचार माध्यमो की अल्पता के बावजुद पुरे विश्व में गुंजी। भारत में अहिंसा के प्रयोग के साथ सत्य के मार्ग का अनुसरण करते हुये महात्मा गांधी ने भारतवासियो के अंतिम पंक्ति के नागरिको की लडाई अहिंसा के माध्यम से लडी उसका बिरला उदाहरण विश्व में कही नही देखने को मिलता है। विश्व को गांधी दर्शन के माध्यम से नवीन राह दिखाने वाले पूज्य बापु महात्मा गांधी ने अनेक जन अहिंसात्मक आंदोलन अंग्रेजो के विरूध्द चलाये। उन आंदोलनो के माध्यम से भारत में बिट्रीश आंदोलन की जडे हिली किन्तु सीधे तोर पर महात्मा गांधी ने अंग्रेजो को भारत से बाहर निकालने के लिये जिस आंदोलन का शं,खनाद किया उस आंदोलन को देश के इतिहास में भारत छोडो आंदोलन के नाम से जाना जाता है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिंसात्मक काकोरी कांड के चलते आंदोलन स्थिगित करने के ठीक 17 वर्ष उपरांत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन 8 अगस्त 1942 को भारत छोडो आंदोलन चलाने का प्रस्ताव पारित हुआ जिसे ठीक दुसरे दिन 9 अगस्त 1942 से पुरे भारत में आजादी की ललक देशवासियो में जाग उठी। यह पहला मौका था तब सीधे तौर पर अंग्रेजो के खिलाफ गांधीवादी तरिके से भारतवासियो ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में व्यापक आंदोलन छेडते हुये उन्हें भारत से निकालने के लिये कटीबध्द नजर आये।
भारत में लगातार बढती स्वराज की मंाग थी किन्तु अंग्रेज भारत वासियो को पूर्ण स्वराज देने के पक्ष में नही थे। लगातार कांग्रेस के नेतृत्व में बढते पूर्ण स्वराज की मांग के बीच बिट्रेन ने भारत वासियो से चर्चा के लिये किप्स मिशन की स्थापना की किन्तु किप्स मिशन से चर्चा जैसे की संभावनाओ के अनुसार विफलता तय थी महात्मा गांधी ने बिट्रीश शासन के खिलाफ भारत छोडो आंदोलन के रूप में तीसरा बडा आंदोलन था जिसका व्यापक असर जनमानस में देखने को मिला। देश में अंग्रेजी हुकुमत के प्रति बढती घृणा एवं बापु की लोकप्रियता का परिणाम इसी बात से होता है कि आंदोलन प्रारंभ होने की घोषणा के बाद महात्मा गांधी को फोरन अंग्रेज सरकार ने गिरफतार कर जेल भेज दिया। गांधीजी की गैर मौजुदगी के बावजुद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में देशवासियो ने जबदस्त विरोध दर्ज करवाया। यह वही समय था जब द्वितीय विश्व युध्द के दौरान बिट्रेन जर्मनी व अन्य देशो के विरूध्द अनेक देशा में युध्द लड रहा था। पुरा यूरोप द्वितीय विश्व युध्द की आग में जल रहा था जिसके कारण भारत में अंग्रेजो का पुरा ध्यान विश्व युध्द के पल-पल बदलते समीकरण एवं परिस्थितियो पर था। भारत में अंग्रेजो ने कांग्रेस नेताओं को तमाम तरह से आंदोलन वापस लेने के लिये मनाया, दबाव डाला किन्तु कांग्रेस ने देश के विभिन्न स्थानो पर बडे नेताओं की गिरफतारी के बावजुद कुशलता से आंदोलन आगे बढाते रहे। भारत छोडो आंदोलन के असर का अंदाजा इसी बात से होता है कि अंग्रेजा को यह आंदोलन दबाने के लिये लगभग एक साल तक संघर्ष करना पडा। यह दुसरा मौका था जब अंग्रेज 1857 की क्रांति के बाद पुरे देश में भारत छोडो आंदोलन के चलते अपनी हुकुमत को खतरा महसुस हुआ। यह आंदोलन अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना है। इस आंदोलन के माध्यम से भारतवासियो ने स्वाधीनता के लिये प्रस्ताव लाते हुये कांग्रेस ने कहा कि भारत पूर्ण स्वाधीनता हासिल करेगा। भारत स्वाधीनता के उपरांत अपने संसाधनो के माध्यम से फांसीवादी एवं सामा्रज्यवादी ताकतो के खिलाफ लड रहे देशो की ओर से युध्द में शामिल हो जायेगा।
भारत छोडो आंदोलन का प्रस्ताव पारित होने के बाद ग्वालिया टैक मैदान में महात्मा गांधी ने यही पर करो या मरो का छोटा सा मंत्र दिया था। गांधीजी ने कहा था कि आप अपने हदय में अंकित कर ले और अपनी हर सांस में उसे अभिव्यक्ति करे, यह मंत्र करो या मरो का है। हम या तो आजादी प्राप्त करेगे या फिर अपनी जान दे देगे। इस नारे का प्रतिफल रह रहा कि जहां तक संभव रहा देशवासियो ने शांतिपूर्ण आंदोलन किया किन्तु अंग्रेजो के दमन से क्रोधित देशवासियो ने अनेक स्थानो पर रेल पटरिया उखाड दी, डाकघर जला दिये। अनेक पुलिस स्टेशन आग के हवाले हो गये। इस आंदोलन के उपरांत अंग्रेजो का यह समझ आ गया कि अब भारत में ज्याद समय तक टिके रहना संभव नही है, उन्होनें द्वितीय विश्व युध्द के दौरान आंतरिक रूप से ही भारत को आजाद कर देने का फैसला किया जिसकी परिणीति स्वरूप भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया।
आज भारत स्वाधीनता के बंधनो से मुक्त होने के बावजुद वर्तमान में धार्मिक कट्रता के विष से गुजर रहा है। देश में सर्वधर्म समभाव एवं समाजवाद की जडो पर निश्चित रूप से कुटारघात महसुस होता है। भारतीय लोकतंत्र जिसकी स्थापना के लिये महात्मा गांधी ने नीव की ईट के रूप में कार्य किया और कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के विचारो से असहमति के बावजुद स्वच्छ लोकतंत्र की परंपरा को आगे बढाया आज उसी परंपरा को समाप्त करने का षडयंत्र हो रहा है। जिस प्रकार से महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोडो आंदोलन चला उसी तरह वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ आमजन का जागरण करते हुये पुनः देश के मूलभूत सिध्दांतो को मजबूत करते हुये देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने की जरूरत है। महात्मा गांधी ने जो दिशा और दर्शन हमे प्रदान किया है वह कल भी प्रासंगिक था और आज के हालातो मे ओर भी प्रासंगिक हो गया है।
आलेख
नवकृष्ण पाटील
अध्यक्ष
जिला कांग्रेस मंदसौर