इच्छा स्वीच के आॅफ होते ही मन पंखा बंद हो जाता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.


मन्दसौर। इच्छा संसारी प्राणी का अकाट्य लक्षण है, हर संसारी में इच्छाओं का जाल बिछा रहता है। कम्प्यूटर सब कुछ कर सकता है, इच्छा नहीं कर सकता। इच्छा मन का गहनतम रूप है, इच्छा ही जड़ और चेतन के बीच की विभाजक रेखा है, जड़-जड़ होता है उसमें किसी तरह की इच्छा नहीं होती, चेतन-प्राणी में इच्छाओं का सिलसिला चलता ही रहता है। सभी इच्छाएँ पूर्ण हो यह संभव नहीं, कुछ इच्छाएं पूर्ण होती है। इच्छाओं की पूर्ति प्रयत्न साध्य है। प्रक्रिया और प्रयोग ये इच्छा शक्ति के दो सशक्त आधार है, इनके द्वारा ही मानव अपनी इच्छाओं की पूर्ति करता है। इच्छा भावना जगत से प्रादूर्भात होती है और इच्छा के अनुसार कार्य सम्पादित होते है। इच्छा होना बुरा नहीं है, मगर कुत्सिक इच्छाएं बुरी होती है। कुत्सित इच्छाधारी अपने स्वार्थों की पूर्ति चाहता है, उसमें किसी का कितना भी नुकसान हो जाए इसकी चिंता वह नहीं करता उसके सामने बस अपनी इच्छापूर्ति का सपना होता है। कुत्सित इच्छाएं ही मन को चंचल, इन्द्रियों को उच्छृंखल और भावनाओं को प्रदूषित करती है। इनसे बचना चाहिए।
ये विचार शास्त्री काॅलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य पूज्य श्री विजयराजजी म. सा. ने 4 सितम्बर, शुक्रवार को प्रसारित अपने मंगल सन्देश में कहे। आपने कहा-मन का पंखा तब बंद होगा जब उसको गति देने वाली इच्छा को रोक देंगे। इच्छा स्वीच के आॅफ होते हुए मन पंखा बंद हो जाता है, जब तक इच्छा का वेग है तब तक मन गतिशील रहेगा। कई लोग मन की चंचलता से बेहाल होते है, उन्हें पता नहीं इस चंचलता का कारण क्या है? मन की चंचलता इच्छाओं के कारण होती है, इच्छाएं शांत है तो मन भी शांत हो जायेगा। इच्छा है तो प्रमाद भी होगा, कषाय भी होगा, अशुभ योग और चंचलता भी होगी। इन पर नियंत्रण तभी हो सकता है जब हम अपनी इच्छाओं को नियंत्रित कर लेते है।

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